By Senior Crime Desk | Meerut
Updated: 12 January 2026
10 जनवरी की शाम। उत्तराखंड का रुड़की रेलवे स्टेशन। यात्रियों की भीड़ के बीच एक युवक सहारनपुर से हरिद्वार जाने वाली ट्रेन में बैठा था। उसके चेहरे पर पुलिस से बचने की घबराहट थी। उसने पास बैठे एक यात्री से फोन मांगा और एक नंबर मिलाया। उसे लगा यह एक मामूली कॉल है, लेकिन उसे नहीं पता था कि यह कॉल सीधे पुलिस के सर्विलांस रडार पर जा रही थी। जैसे ही उसने कहा—"मैं निकल रहा हूँ"—इधर मेरठ पुलिस के वायरलेस सेट घनघना उठे। चंद मिनटों में ट्रेन को रोका गया, बोगियों को घेरा गया और वह चेहरा बेनकाब हो गया जिसकी तलाश में पश्चिमी यूपी की पुलिस पिछले 54 घंटों से खाक छान रही थी।
यह कहानी है मेरठ के कपसाड़ गांव (Kapsad Village) की, जहां एक मां ने अपनी बेटी की आबरू बचाने के लिए अपनी जान की बाजी लगा दी।
8 जनवरी की वो खौफनाक सुबह: क्या हुआ था खेतों में?
तारीख 8 जनवरी 2026। सुबह के 8 बज रहे थे। कोहरा अभी पूरी तरह छंटा नहीं था। 45 वर्षीय सुनीता देवी (दलित समुदाय) अपनी 20 वर्षीय बेटी रूबी (काल्पनिक नाम) के साथ खेतों की ओर जा रही थीं। सरधना थाना क्षेत्र का यह इलाका गन्ने के खेतों से घिरा है।
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अचानक, एक कार उनका रास्ता रोकती है। उसमें से पारस सोम (ठाकुर समुदाय) और सुनील राजपूत अपने साथियों के साथ उतरते हैं। उनका इरादा साफ था—बेटी को उठाना। लेकिन उन्हें अंदाजा नहीं था कि एक मां ढाल बनकर खड़ी हो जाएगी। सुनीता देवी ने पूरी ताकत से विरोध किया। जब पारस अपनी कोशिश में नाकाम होने लगा, तो उसने आव देखा न ताव—हाथ में मौजूद धारदार 'फरसे' से सुनीता देवी पर ताबड़तोड़ वार कर दिए।
खेत की मिट्टी खून से लाल हो गई। मां ने मौके पर ही दम तोड़ दिया, और आरोपी बेटी को जबरन गाड़ी में डालकर फरार हो गए। यह सिर्फ एक हत्या नहीं थी, यह एक मां के बलिदान की दास्तां थी जिसने पूरे उत्तर प्रदेश को झकझोर कर रख दिया।
54 घंटे का 'मैनहंट' और सर्विलांस का जाल
हत्या के बाद पुलिस पर चौतरफा दबाव था। एक तरफ सपा और भीम आर्मी का अल्टीमेटम, दूसरी तरफ लखनऊ मुख्यालय की सख्ती। आईजी और डीआईजी स्तर के अधिकारी गांव में कैंप कर रहे थे।
पुलिस ने आरोपियों को पकड़ने के लिए जाल बिछाया, लेकिन पारस सोम शातिर निकला। वह लगातार अपनी लोकेशन बदल रहा था। आखिरकार, पुलिस ने पारंपरिक मुखबिरी और आधुनिक तकनीक का मिश्रण किया। पुलिस ने पारस के गांव के एक 'झोलाछाप डॉक्टर' के नंबर को सर्विलांस पर रखा हुआ था, जिससे पारस के संपर्क करने की प्रबल संभावना थी।
और वही हुआ। 10 जनवरी को ट्रेन में सफर करते वक्त पारस ने अपना फोन बंद रखा था, लेकिन गलती से उसने सह-यात्री का फोन मांगकर उसी डॉक्टर को कॉल कर दिया। बस यही वो 'डिजिटल सुराग' था जिसका पुलिस को इंतजार था। सहारनपुर से हरिद्वार जा रही ट्रेन को रुड़की में रोककर जब पुलिस ने दबिश दी, तो पारस के साथ अपहृत बेटी भी बरामद कर ली गई।
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सुलगती सियासत और परिवार की जिद
कपसाड़ गांव छावनी में तब्दील हो चुका था। नगीना सांसद चंद्रशेखर आजाद ने बैरिकेड्स तोड़े, तो अखिलेश यादव और मायावती ने सोशल मीडिया पर सरकार को घेरा। यह मामला केवल अपराध का नहीं, बल्कि पश्चिमी यूपी की जटिल जातिगत राजनीति (Dalit vs Thakur) का केंद्र बन गया।
सुनीता देवी का शव 24 घंटे तक रखा रहा। परिवार की जिद थी—"जब तक बेटी नहीं मिलेगी और हत्यारे नहीं पकड़े जाएंगे, अंतिम संस्कार नहीं होगा।" प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए थे। भारी मान-मनौव्वल और कार्रवाई के ठोस आश्वासन के बाद ही परिवार ने अंतिम संस्कार की अनुमति दी।
लव अफेयर या अपहरण? कहानी का दूसरा पहलू
गिरफ्तारी के बाद कहानी में एक नया मोड़ आया है। पुलिस पूछताछ में मुख्य आरोपी पारस सोम ने दावा किया है कि यह अपहरण नहीं था। उसका कहना है कि वह और युवती पिछले 3 साल से प्रेम प्रसंग (Relationship) में थे और युवती अपनी मर्जी से उसके साथ गई थी।
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हालांकि, पुलिस इस दावे को आरोपी का 'बचाव पैंतरा' मान रही है। कानून की नजर में, एक मां की हत्या कर बेटी को ले जाना कतई प्रेम नहीं हो सकता। अब सारी निगाहें कोर्ट में होने वाले युवती के धारा 164 के बयानों पर टिकी हैं। क्या वह पारस के दावे की पुष्टि करेगी या अपनी मां के हत्यारे के खिलाफ गवाही देगी? यही बयान इस केस की दिशा तय करेगा।{ Jammu Smvd Medical College Read Full Report}
आगे क्या?
फिलहाल, पुलिस ने राहत की सांस ली है कि बेटी सुरक्षित है। आरोपी सलाखों के पीछे हैं। लेकिन के उस घर में मातम पसरा है जहां एक मां अब कभी लौटकर नहीं आएगी। यह घटना एक बार फिर सवाल खड़ा करती है—क्या यूपी के गांवों में दलित महिलाएं और बेटियां वाकई सुरक्षित हैं, या वे आज भी दबंगई और जातिगत अहंकार के साये में जीने को मजबूर हैं?
आप इस बारे में क्या सोचते हैं? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर लिखें।
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